ज्ञान पिपासा

Thursday, 7 June 2018

आपदा से पहले गौरीकुण्ड से केदारनाथ पैदल यात्रा

आपदा से पहले गौरीकुण्ड से केदारनाथ पैदल यात्रा
नौकरी के अभाव में लोगों को आजीविका के लिए अधिकतर कृषि, मजदूरी और व्यापार ही विकल्प बचते हैं। उत्तराखण्ड के पुरुषार्थ चतुष्टय प्रदाता चारों धाम, उनके निकटवर्ती वासियों के लिए अर्थ प्राप्ति के प्रमुखतम आश्रय हैं। 2012 तक केदारनाथ की 14 किमी यात्रा केवल पैदल मार्ग से ही होती थी। वहां यात्री पहुंचाने के लिए अनेक मजदूर, व्यापारियों आदि की आवश्यकता होती थी, इसलिए विशेषकर रुद्रप्रयाग व चमोली जिले के लोगों के लिए केदारनाथ के पट खुलना किसी त्यौहार की तरह होता था। एक महीने पहले से ही ढाबे वाले केदारनाथ तक के पैदल मार्ग के किनारों पर घास से छप्पर बना देते और पक्की दुकानों पर रंग रौगन हो जाता। बिजनौर से अहर्निश चलने वाले घोड़े वालों के दल रास्ते लग जाते। छात्रों के चेहरों पर भी रौनक छा जाती, क्योंकि उन्हें भी अपने खर्च के लिए गर्मियों की छुट्टियों में पैसा कमाना होता था। उनमें से कोई मजदूर, कोई गाईड तो कोई फोटोग्राफर आदि बन जाते। गौरीकुण्ड के नजदीक की मेहनती महिलाओं का तो घास भी बिक जाता।
भगवान् केदारनाथ की डोली गौरीकुण्ड पहुंचने के दिन से ही वहाँ से 2-3 किमी पीछे तक गाड़ियों की लम्बी कतारें होतीं थीं। गावों के लोग भी दूर अपने घरों से छज्जों, जंगलों से केदारनाथ मोटर मार्ग पर रात अथवा दिन में गाड़ियों की लम्बी कतारें देखकर अगले दिन गौरीकुण्ड की तरफ चल देते। छोटे बच्चे तो बहुत दूर के गांवों से ही गाड़ियों की गिनती भी कर देते। किसी को अपना मकान बनाना होता, किसी को 6 महीने का उधार चुकाना होता तो किसी को घर में अपने लड़का-लड़की की शादी करनी होती अथवा वे पढ़ाने होते, इसलिए वहां जाना ही होता।
गौरीकुण्ड की चहल पहल देखते ही बनती थी। वहां से दायीं तरफ की मन्दाकिनी नदी के स्पर्श से अधिक शीतल हुई वायु देश- विदेश के यात्रियों की गर्मी के मौसम की रास्ते भर की भयंकर गरमी क्षण भर में उतार देती थी। यात्रियों के बस से उतरते ही घोड़े खच्चर वाले, डण्डी- कण्डी वाले और होटल वाले उनको घेर लेते। केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित भी उनका पता पूछते ताकि उनकी उचित व्यवस्था कर सकें।
यात्री गौरीमाता के दर्शन करते, गौरीकुण्ड में नहाते और फिर केदारनाथ जाने के लिए गरम कपड़े, छाता/ बरसाती और आवश्यक भोजन खरीदते। कुछ यात्रियों, विशेषकर बंगाली बाबुओं के गले में कैमरे लटके होते तो कुछ फोटोग्राफरों से विशेषकर गौरीकुण्ड व केदारनाथ में अपनी फोटो खिंचवाते।
गौरीकुण्ड से केदारनाथ की यात्रा चार प्रकार से होती- पैदल चलकर अथवा डण्डी(पीनस,पालकी), कण्डी या घोड़े में बैठकर। सुना है कि अब पांचवा 'सबसे बड़ा' प्रकार आ गया है- हेली सेवा।
यह यात्रा एक दिवसीय अथवा द्विदिवसीय होती थी। एक दिवसीय के लिए गौरीकुण्ड से प्रातःकाल चलना होता। मजदूर लोग अपने काम की गिनती दिनों में न करके 'चक्कर' में करते।
 डण्डी आदि की मजदूरी यात्रियों के वजन के आधार पर तय होती थी।
पैदल यात्री अपने लिए लाठी खरीदते। उनको रामबाड़ा से गरुड़ चट्टी शौर्ट कट का लाभ मिलता। सभी के लिए केदारनाथ तक रास्ते पर चढ़ना कठिन है पर उतरना बहुत सरल है।
वृद्ध यात्री प्रायः डण्डी(पीनस,पालकी)में जाते। शादी में दुल्हन जिस डोली में बैठती है, वही डण्डी होती है। उसको ढोने के लिए चार व्यक्तियों के दल होते थे। जो किराया मिलता उसको चार व्यक्तियों में बांटा जाता। कंधों पर घाव न पड़े एक कम्बल जो कि शाम को सोने के भी काम आता।
कण्डी में बैठने का मोढ़ा होता था। उसको मोटी रस्सी से माथे पर अटकाया जाता है। इसके लिए ताकत अधिक चाहिए, नेपाली लोग इसमें माहिर होते हैं। पैदल वाला लाभ इन्हें भी था।
कुछ यात्री घोड़े अथवा खच्चर में जाते थे। उनके साथ घोड़े वाला एक कुशल घोड़्या/खचर्या( घोड़ा-खच्चर हांकने वाला) होता था।
यात्रियों को घोड़े में ढंग से बैठने की हिदायत घोड़े वाले रास्तेभर में देते रहते थे। महिला यात्रियों के लिए 'माई' और पुरुषों को ' बाबू जी' सम्बोधन प्रचलित था। रास्ते में भीड़ वाली जगह पर 'साईड' 'साईड' चिल्लाना सभी श्रमिकों का कर्तव्य था। सकुशल केदारनाथ यात्रा कराने के बाद 10-20 रुपये अतिरिक्त 'बख्शीश' के रूप में इनको बिन मांगे भी मिल जाते थे।
इन सभी प्रकार के मजदूरों को जिला पंचायत की तरफ से पर्ची कटानी होती थी, नहीं तो एजेंट पकड़ देता था।
जो युवा इन कामों को करते, उनमें से कई बाद में अच्छी अच्छी सरकारी नौकरियों पर भी लगते। जीवन में कभी भी निठल्ला रहना उनके लिए अपराध होता।
गौरीकुण्ड से आगे 3 किमी बाद सबसे पहले जंगल चट्टी पड़ती है। यहाँ तक घना जंगल होने से यह नाम पड़ा होगा। ज्यों ज्यों आप इस मार्ग पर चढ़ते जायेंगे, वृक्ष आपका साथ छोड़ते जायेंगे। चट्टी शब्द का अर्थ हिन्दी डिक्शनरी में भी पर्वतीय पैदल यात्रा का पड़ाव है। यमुनोत्री की यात्रा में तो 14 चट्टियों से साक्षात् होता है।
मजदूर लोग अपने परिचित दुकानदार के पास सुस्ताते थे।
आते-जाते पदयात्रियों और जगह जगह छोटी गुफाओं में धूनी रमाकर और भभूत लगाकर कृत्रिम "भोलेनाथ' बने साधुओं के 'जय केदार', 'बम बम भोले' आदि उद्घषों से पूरा मार्ग मुखरित रहता था। बाबा लोग हो सके तो हाथ में 'कुछ' लेकर कहीं," बम भोले, कैलास के राजा, दम लगाने को आ जा।" बोलते दिखते।
घोड़ों (प्रायः खच्चरों के जोड़े होते हैं।)के माथे पर लगा दर्पण दूर से ही चमक जाता था और उनके गले की घंटियों की ध्वनि भी दूर से ही नयी नवेली दुल्हन के घुंघरुओं की तरह बजती सुनाई देती। वे पूरे रास्ते भर में नियत स्थान में ही लघुशंका पर जाते थे। अनुशासन, वफादारी और मेहनत में वे हम मनुष्यों से बहुत आगे हैं।
जगल चट्टी से आगे धीरे धीरे प्राण वायु कम होती जाती है, लेकिन जगदीश्वर से लौ लगने से आत्म बल के आगे प्राण बल फीका पड़ जाता है।
घुड़सवार सैलानी तो केदार घाटी के ऊंचे ऊंचे पर्वतों के निचले भागों में वृक्ष और चोटियों पर बर्फ, रास्ते के किनारों पर साक्षात् नाग की आकृति के पौधे, बुग्याल, दूधिया मन्दाकिनी, ग्लेशियर, शीतल वायु- जल और मनोरम झरने आदि देखकर Robert Frost की तरह शायद यही सोचते होंगे-
The woods are lovely, dark and deep,
But I have promises to keep,
Miles to go before I sleep,
And miles to go before I sleep.
आगे 4 किमी की दूरी पर रामबाड़ा बाजार था, उससे पहले एक ग्लेशियर को काट कर मार्ग बना होता था। इस बाजार की दायीं तरफ कल कल करती मन्दाकिनी और एक झरने के दर्शन होते थे। यह नदी कभी इतनी 'तीव्रगामिनी' बनेगी कोई सोचता भी न था।
इस बाजार में भी सभी प्रकार दुकाने होतीं थी।
उससे आगे गरुड़ चट्टी तक इस यात्रा की सबसे कठिन चढ़ाई थी। 3 किमी बाद बीच में पैदल व कण्डी वाले 'घिनुरपाणी' नामक जगह से वंचित होते थे,क्योंकि उनको शौर्टकट भी वैध था।
उससे 2 किमी आगे गरुड़ चट्टी में एक महात्मा जी का आश्रम था, जो कि प्रतिदिन नंगे पांव केदार बाबा के दर्शन करने जाते थे। उसमें एक हनुमान् गुफा भी थी। थके मजदूर व यात्री वहां की दुकानों में गरम गरम चाय पीते व एक सूरदास जी के भजन सुनते।
गरुड़ चट्टी से आगे केदारनाथ 2 किमी का लगभग सीधा मार्ग था, मानों भोले नाथ ने कठिन यात्रा की परीक्षा में कुछ ढील दी हो। श्रद्धालुओं का केदारनाथ दर्शन की लालसा से उत्साह बढ़ता जाता। केदारनाथ के निकट से वहां विराट हिमालय ऐसा दीखता है कि मानो भगवान् केदारनाथ के सिंहासन के पीछे का पट्ट हो और इसी प्रकार मानो बायें दांयें के विशाल पर्वत भी बायें दांयें की पट्टियाँ (तख्तियां) हों।
उस सौन्दर्य राशि हिमालय के दर्शन होते ही पूरे रास्ते की थकान पलायन कर जाती। अनजान यात्री केदारनाथ मन्दिर को देखकर ठिठक जाते। विस्मित मन हुए वे यही सोचते होंगे, "इतने दुर्गम व निर्जन स्थल पर आखिर यह इतना विशाल व भव्य मन्दिर किसने, कब, क्यों और कैसे बनाया होगा! इतने पुराने समय में एक ही प्रकार इतने बड़े पत्थर किसने, कहाँ से व कैसे ढोये होंगे!!" वहाँ का दिव्य सौन्दर्य देखकर उनको लगता होगा कि कहीं वे अन्य लोक तो नहीं पहुंच गये!!!
केदारनाथ बाजार पहुंचने से पहले मन्दाकिनी पर बना पुल पार करना पड़ता। घुड़सवार उसके पहले ही उतर जाते। केदारनाथ बाजार में भी दिल्ली की तरह पूरा सामान मिलता था। होटल वालों को भी गरमपानी करने व पूरी छोले बनाने के आर्डर मिल जाते।
पहले मोबाईल भी नहीं थे। वहां लोगों को घर से आने वालों से सूचना मिलती रहती व इसी प्रकार घर के लोग आने वालों से केदारनाथ धाम की तरफ के समाचार पाते।
एक दिन में ही वापस होने वाले यात्री जल्दी जल्दी हाथ मुंह धोकर, पूजा की थाली लेकर अपने तीर्थ पुरोहित के साथ अथवा यों ही दर्शनार्थियों की पंक्ति में लगते। सबसे पहले उनको मन्दिर के आंगन में नन्दीगण के दर्शन होते हैं, फिर देहरी पर गणेश जी के और अन्दर पांचों पाण्डवों के दर्शन होते हैं। अन्त में भगवान् केदारनाथ के स्वयम्भू, विना उकेरे (काट छांट किये) गये ज्यों के त्यों पत्थर के विशाल शिवलिंग के दर्शन होते हैं। विराट वृषभ रूपी शिव का यहाँ उसके शरीर का, पृष्ठ भाग प्रकट हुआ था। यात्रियों की भीड़ के कारण भोले नाथ की पूजा थोड़ी देर तक ही करके भक्त अपने को कृतकृत्य मानते हैं। मन्दिर की परिक्रमा कर भक्त केदारनाथ के पीछे शंकराचार्य समाधि, उदक कुण्ड व अन्त में आधे किमी की दूरी पर भैरवनाथ के दर्शन करते हैं।
कुछ यात्री केदारनाथ में ही विश्राम करते थे और प्रातःकाल वापस आते थे।
केदारनाथ घाटी में जून को हुए 2013 अप्रत्याशित जल प्रलय के कारण कई आत्माएं शिवलोक को प्राप्त हुईं और वहाँ के रोजगार के सारे साधन नष्ट हो गये।
सुना है, अब तो गुप्तकाशी से चन्द घण्टों में ही हेलीकॉप्टर से केदारनाथ की यात्रा हो जाती है और आगामी वर्षों में भक्त आधिकाधिक  संख्या में वायु मार्ग से ही यात्रा करेंगे। दुःख तो विशेषकर रुद्रप्रयाग व चमोली के निवासियों का है, जिनका कि सब कुछ लुट गया है। उनको शीघ्र रोजगार के नये रास्ते चुनने होंगे।
काश 'बड़े दर्शनार्थी' लोग कुछ उनके बारे में भी सोचते।
हिन्दू धर्म की तरह यात्राएं भी शाश्वत हैं, लेकिन यहाँ के वो पुराने दिन तो कभी नहीं लौटेंगे। फिर भी हम कतई निराश नहीं हैं। यात्रा के स्थल व प्रकार थोड़ा भिन्न हो सकते हैं और भक्त बराबर दर्शन करते रहेंगे।
भगवान् केदारनाथ से प्रार्थना है कि 'वैसे' बीभत्स 'संकट के बादल' दुनियां में कभी, कहीं और किसी के लिए भी न छाएं और अपने भक्तों को सदैव बुलाते रहें।
-सच्चिदानन्द सेमवाल, अध्यापक संस्कृत विद्यालय चैैधार, पौड़ी गढ़वाल।

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